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खेती में अगर सबसे ज्यादा अनदेखी की गई किसी चीज़ की बात करें,
तो वह है मिट्टी की जांच।
अजीब बात यह है कि किसान बीज खरीदते समय पूछता है,
खाद लेते समय पूछता है,
लेकिन जिस मिट्टी में सब कुछ उगना है,
उसी को समझने की कोशिश नहीं करता।
और फिर जब फसल कमजोर निकलती है,
तो दोष मौसम, खाद या किस्म को दे दिया जाता है।
मिट्टी की जांच आखिर जरूरी क्यों है?
मिट्टी सिर्फ धूल नहीं है।
वही तय करती है कि फसल कितनी मजबूत होगी,
खाद कितनी लगेगी
और उत्पादन कितना निकलेगा।
जब हम बिना जांच के खाद डालते हैं,
तो हम यह नहीं जानते कि:
- किस चीज़ की कमी है
- किस चीज़ की ज्यादा मात्रा है
ऐसी खेती किस्मत के भरोसे चलती है,
और किस्मत हर साल साथ नहीं देती।
किसान मिट्टी की जांच से क्यों बचता है?
अधिकतर किसान यह सोचते हैं:
- इसमें समय लगेगा
- सरकारी काम है, झंझट होगा
- खर्च बेकार जाएगा
लेकिन सच्चाई यह है कि
₹300–₹500 की जांच हजारों रुपये की खाद बचा सकती है।
मिट्टी की जांच से खेती अंदाज़े से निकलकर
समझदारी की तरफ जाती है।
मिट्टी की जांच के लिए नमूना कैसे लें?
यहीं सबसे ज्यादा गलती होती है।
कई किसान खेत के एक कोने से मिट्टी उठाकर दे देते हैं,
और सोचते हैं कि यही काफी है।
असल तरीका थोड़ा अलग है।
खेत के 4–5 अलग-अलग हिस्सों से
ऊपर की 6–8 इंच मिट्टी लें।
सारी मिट्टी को मिलाकर
एक साफ कपड़े या पॉलीथिन में रखें।
इससे जो नमूना बनता है,
वह पूरे खेत की सही स्थिति बताता है।
मिट्टी की जांच कहाँ कराएं?
आज लगभग हर जिले में:
- सरकारी मिट्टी जांच प्रयोगशाला
- कृषि विभाग
- कृषि विज्ञान केंद्र
मिट्टी की जांच की सुविधा देते हैं।
कई जगह मोबाइल मिट्टी जांच वैन भी आती है।
रिपोर्ट आमतौर पर 7–15 दिन में मिल जाती है।
मिट्टी की रिपोर्ट देखकर किसान डर क्यों जाता है?
क्योंकि रिपोर्ट अंग्रेज़ी और नंबरों में होती है।
N, P, K, pH जैसे शब्द देखकर
किसान सोचता है कि यह उसके बस की बात नहीं।
लेकिन असल में रिपोर्ट उतनी मुश्किल नहीं होती,
जितनी दिखती है।
मिट्टी की रिपोर्ट में सबसे पहले क्या देखें?
रिपोर्ट में कई चीज़ें लिखी होती हैं,
लेकिन किसान को सबसे पहले तीन बातों पर ध्यान देना चाहिए।
पहली – pH वैल्यू
pH यह बताता है कि मिट्टी:
- ज्यादा खट्टी है
- ज्यादा क्षारीय है
- या संतुलित है
अगर pH बहुत ज्यादा ऊपर-नीचे है,
तो फसल खाद नहीं ले पाती।
अधिकतर फसलों के लिए
मध्यम pH सबसे अच्छा रहता है।
दूसरी – नाइट्रोजन (N)
नाइट्रोजन फसल की हरी बढ़वार के लिए जरूरी होती है।
अगर रिपोर्ट में नाइट्रोजन कम है,
तो पत्तियाँ पीली पड़ती हैं
और फसल कमजोर रहती है।
लेकिन ज्यादा नाइट्रोजन भी नुकसान देती है,
क्योंकि तब फसल सिर्फ पत्ती बनाती है,
दाना या फल नहीं।
तीसरी – फास्फोरस (P) और पोटाश (K)
फास्फोरस जड़ों को मजबूत करता है
और फूल-फल बनने में मदद करता है।
पोटाश फसल को:
- बीमारी से लड़ने की ताकत देता है
- दाना भरने में मदद करता है
अगर इनमें से कोई एक भी कम हो,
तो उत्पादन प्रभावित होता है।
रिपोर्ट मिलने के बाद सबसे बड़ी गलती क्या होती है?
सबसे बड़ी गलती यह है कि
रिपोर्ट दराज में रख दी जाती है।
मिट्टी की जांच तभी काम की है,
जब उसके हिसाब से खाद डाली जाए।
अगर रिपोर्ट कहती है कि:
- नाइट्रोजन कम है → वही बढ़ाइए
- फास्फोरस ज्यादा है → बेवजह मत डालिए
हर फसल के लिए खाद का तरीका बदलना पड़ेगा।
क्या हर साल मिट्टी की जांच जरूरी है?
हर साल नहीं,
लेकिन हर 2–3 साल में जांच बहुत जरूरी है।
खासतौर पर तब:
- जब उत्पादन गिर रहा हो
- जब जमीन सख्त हो रही हो
- जब ज्यादा रासायनिक खाद डाली जा रही हो
मिट्टी भी थकती है,
उसे समझना जरूरी है।
मिट्टी को समझना खेती को समझना है
जिस किसान ने अपनी मिट्टी को समझ लिया,
उसने आधी खेती समझ ली।
मिट्टी की जांच:
- खर्च नहीं है
- समय की बर्बादी नहीं है
यह खेती का सबसे समझदारी भरा निवेश है।